बुधवार, 27 अगस्त 2014

सेंसर बोर्ड ।। पारखी मंडल ।। अभिवेचन संघ

सबको बहुत पीड़ा होती है जब बलात्कार और दुष्कर्म जैसी घटनाएँ सामने आती हैं। हमारे देश का शासन भी इसमें चिंतित होता है और साथ में आश्चर्य भी अनुभव करता है। मंथन करता है चिंतन करता है किन्तु सब व्यर्थ जाता है।

आखिर क्यों ??????
बहुत ही विचारणीय है।

यदि हमारी मानें तो इनसब घटनाओं का श्रेय सेंसर बोर्ड एवं फ़िल्मी जगत को जाता है जो सरकार द्वारा आधारभूत हैं।
इनके परिजनों के साथ ऐसी घटनाएँ इसलिए नहीं घटतीं क्योंकि इनके साथ सरकारी सुरक्षा है , ये धनवान हैं, निजी सुरक्षाबलों के साथ भी चलते हैं।
अन्यथा फिल्मों में कामोद्दीपक(porn) अभिनय करने वाली अभिनेत्रियों के साथ यह सबसे ज्यादा घटित होता। साथ ही अभिनेताओं के परिजनों के साथ भी।
ये अवैध भी नहीं होता क्योंकि ये व्यक्ति इसी के प्रचार-प्रसार में लिप्त हैं।

आपने कई बार सुना होगा कि अभद्र पहनावों से ही इस दुष्कर्म की संख्या बढ़ी है, जबकि सबसे अभद्र पहनावे अभिनेत्रियों के ही होते है, अभद्र पहनावों का प्रचार भी इन्हीं के द्वारा होता है।

लेकिन आपने कभी नहीं सुना होगा कि विद्या बालन के साथ दुष्कर्म हुआ, आपने कभी नहीं सुना होगा की प्रियंका चोपड़ा के साथ दुष्कर्म हुआ, आपने कभी नहीं सुना होगा की सनी लियोन अथवा किसी अभिनेता के परिजनों के साथ दुष्कर्म हुआ।

आखिर क्यूँ ???????
इस प्रश्न का उत्तर हम आपसे जानना चाहेंगे ?
Www.drishtikonjagat.blogspot.com

आपका शुभचिन्तक- अंगिरा प्रसाद मौर्या(एक अंगारयुक्त देशभक्त) ।

!!*!! वन्दे - मातरम् !!*!!

रविवार, 24 अगस्त 2014

।। लव जेहाद ।। love jehad

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भारत के प्रहरी हम हैं, हमे नहीं आज्ञा अब चहिए,
आरत के शहरी हम हैं, हमें नहीं संज्ञा अब चाहिए।~~~ APM
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-: love जेहाद :-

लव जेहाद का शाब्दिक अर्थ "धर्मान्तरण हेतु प्रेम करना है" ।
जबकि इसका अक्षरसह अथवा सकारात्मक अर्थ धर्म हेतु प्रेम होना चाहिए, जो आधुनिक परिवेश में मानों लुप्त हो गया है।
"जेहाद" एक उर्दू शब्द है जिसका तात्पर्य धर्म से है। परन्तु आज के परिवेश में इसकी धारणा और अवधारणा दोनों परिवर्तित कर दी गयी हैं, अपने आस पास निरिक्षण कर आप इस तत्व को स्वयं भी समझ सकते हैं।

हमारा मूल विषय "लव जेहाद" का प्रतिकार है, इसे प्रेम विवाह पर प्रहार न मानें तो ही विचार नियत मार्गों द्वारा आपके मष्तिष्क और परमष्तिष्क में प्रवेश कर सकता है।
जय श्री कृष्ण !

इसका प्रतिकार करने हेतु सर्वप्रथम अपने भाषा को परिपक्व करने की आवश्यकता है, अर्थात- उसमे से अपशिष्ट पदार्थों एवं तत्वों को निकाल कूड़ेदान में फेंकने की आवश्यकता है।
पुनः सम्पूर्ण हिन्दू समाज को अपनी जनसंख्या वृद्धि हेतु कड़े निर्णय करने की आवश्यकता है। कम से कम अपने लिए नहीं तो देश के लिए, देश के लिए नहीं तो सृष्टि के लिए आवश्यक है अन्यथा इस जगत से मानवों का पतन सम्भव है।

-: भाषा :-
जिस प्रकार सभी अस्त्रों-शस्त्रों से सुसज्जित होना परम आवश्यक है परन्तु उन्हीं अस्त्रों का उपयोग अपने परिजनों अथवा देश की प्रजा पर करना वर्ज्य है, ठीक उसी प्रकार यदि आप संसार की समस्त भाषाओँ को जानते हैं अथवा जानने का प्रयास करते हैं तो उत्तम नहीं अति उत्तम है किन्तु अपने परिवेश में उनकी छाप छोड़ना अथवा वक्तव्यों में मातृभाषा को छोड़ अधिकतर दूसरी भाषाओँ का उपयोग हमारी संस्कृति(राष्ट्रीय चरित्र) एवं भविष्य के लिए दुर्गति का कारण अथवा घातक है।

भाषाएँ जानना विद्या है, कलाएँ जानना विद्या है और इन्हीं विद्याओं के संयोग से ज्ञान का निर्माण हुआ है, अथवा ऐसा भी कह सकते हैं की विद्याएँ ज्ञान के अंतर्गत अथवा इसी की शाखाएँ या प्रकार हैं। इन वक्तव्यों को एक ही सुर में सभी शिक्षाविद अथवा शिक्षक तुरंत स्वीकार कर लेंगे।
किन्तु हमें पीड़ा तब होती है जब विद्याओं के उपयोग करने का सिद्धांत आधुनिक ज्ञान के अंतर्गत आने के बजाय उसके अंतर में धकेल दिया गया है।

भाषाएँ ही व्यक्ति के वर्ग और चरित्र का प्रमाण हैं। अतः विश्व-श्रेष्ठ हिन्दी भाषा को परिपक्व बनाने की आज महती आवश्यकता है।
।।ॐ।। हम आपसे सहयोग हेतु प्रार्थना करते हैं।।ॐ।।
जय श्री कृष्ण !

-: जनसंख्या वृद्धि :-
यदि हिन्दुओं ने अपनी जनसंख्या वृद्धि नहीं की तो भविष्य में कोई जान ही नहीं पायेगा कि मानव कौन है ?
मानवता क्या है ?
मानव के गुणधर्म क्या हैं ?
यदि आप कल्पना करेंगे तो पाएंगे कि कल केवल आदमी बचेगा ! कल केवल इंसान बचेगा ! जो इंसानियत के नाम पर रोज हैवानियत का खेल करते मिलेंगे।

वास्तव में जो लोग स्वयं को हिन्दी भाषी कहते हैं उन्हें "आदमी" और "इंसान" जैसे शब्दों से दूर रहने की कतिपय आवश्यकता है। विशेषतः विशेष व्यक्तियों के लिए ऐसे शब्द वर्जित ही होने चाहिए।
कारण:-
हमारी हिन्दी शब्दावली के नीति नियमों के अनुसार दूसरे भाषाओं के सभी शब्दों का स्पष्ट अर्थ नहीं निकलता, क्योंकि दूसरी भाषाएँ वैज्ञानिक भाषा न होकर रटंत अथवा बलपूर्वक विद्यमान हैं।

जैसे :- आदमी और मनुष्य :-
आदमी= आद+मी अथवा आदम+ई। इसका कोई अर्थ अथवा तात्पर्य स्पष्ट नहीं हो सकता।
तथा
मनुष्य= मनु+अष्य। मनु अर्थात जगत का पहला व्यक्ति, अष्य का आशय आने से और अर्थ जन्म लेने से है। अर्थात मनु से जन्म लेने वालों को मनुष्य कहते हैं।

इसी प्रकार:- इंसान और मानव :-
इंसान = इन+सान। अब आप अर्थ निकालने जायेंगे तो पता चलेगा कि क्या सान किसको सान किसकी सान और कैसी सान।
परन्तु,
मानव= मान+अव। अर्थात मान-सम्मान हेतु जो अवतरित हुआ है उसे मानव कहते हैं।
अथवा
सम्मान ही जिसका आधार हो वही मानव है।
इसी प्रकार मानवता, अर्थात जिन कर्मों के करने से अनादि काल तक व्यक्ति की आलोचना ना की जा सके वही मानवता के कर्म अथवा गुणधर्म हैं।
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लव जेहाद को लेकर राजनितिक गतिविधि :-

राजनितिक गतिविधि तो आज किसी से नहीं छुपी है इसलिए कम शब्दों में निपटारा करने का अवश्य प्रयास करेंगे।
इस गंभीर तत्व को लेकर हमे अखिलेश यादव की बात बहुत ही हास्यास्पद और गंभीर लगी।
हास्यास्पद इसलिए लगी क्योंकि अखिलेश जनता नहीं जननायक हैं । यदि एक मुख्यमंत्री इस प्रकार बात करता है तो आप उसकी मानसिकता समझ सकते हैं।
गंभीर इसलिए लगा क्योंकि जो अखिलेश ने कहा वह सही कहा और हम उनका समर्थन करते हैं। हम सहमत केवल इसलिए नहीं हैं क्योंकि अखिलेश की यह प्रतिक्रिया लव जेहाद के लिए अनुकूल नहीं।

अखिलेश ही नहीं राम को मानने वाला और प्रत्येक युवा बुद्धिजीवी व्यक्ति हेमामालिनी पर गलत टिपण्णी करे तो भी उचित है। क्योंकि भारतीय जनता पार्टी एक ओर राम और कृष्ण का अनुशरण करती है और दूसरी ओर इसके कृत्य श्री राम के चरित्र और उपदेशों का निन्दा करते हैं।
भगवान कहे जाने वाले श्री राम जी ने एक धोबी के अप्रत्यक्ष आरोप पर अपनी पत्नी सीता जी का त्याग कर दिया, जबकि राम राम कहने वाली भारतीय जनता पार्टी किसको अपना टिकट दे देगी इसका कोई नापतौल अथवा सिद्धांत नहीं है। चंद पैसों के लिए फिल्मों में नाचने वाली हेमामालिनी भाजपा की सांसद हैं, इससे आप भाजपा के चरित्र का अनुमान लगा सकते हैं।
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मूल विषय लव जेहाद है। और इसका प्रतिकार करना अति आवश्यक है। यदि भाजपा इसे समाप्त करना चाहती है तो उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार आना निश्चित है। भाजपा से अनुरोध है कि अपनी पार्टी/दल में बहिष्कार करने योग्य तत्वों का समावेश न करे, अन्यथा सबको ज्ञात है कि परिवर्तन ही संसार का नियम है। लव जेहाद केवल उत्तर प्रदेश का मामला नहीं है यह सम्पूर्ण मानवजाति को आघात है। इस मामले के आरोपियों को तुरंत ही मृत्यु-दान देने से कदापि न चूकें /-
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आपका शुभचिन्तक ___ अंगिरा प्रसाद मौर्या।

!!*!! जय हिन्द !!*!! जय भारत !!*!!

शनिवार, 2 अगस्त 2014

ईश्वर, परमपिता अथवा भगवान के सन्दर्भ में

सादर नमन मित्रों !

हम तो केवल और केवल भगवान अथवा ईश्वर को मानते हैं।
जो परमपिता हैं।
सृष्टि के उदयकाल में पहले उनका ही उदय हुआ और उनका नामाकरण करने वाला कोई था ही नहीं, इसीलिए उन्हें परमपिता कहके संबोधित किया जाता है।
बाद में कुछ ज्ञानियों और महाविद्वानों ने उन्हें कृष्ण कह दिया। कृष्ण का तात्पर्य घनघोर अंधकार को दूर करने वाले से है। हिन्दी शब्दार्थ के नियमावली अनुसार कृष्ण का तात्पर्य कृपालु से भी है। अर्थात:- जिसने अंधकार को दूर किये रखा है अथवा जिसके सामर्थ्य पर प्रकाश अथवा सत्य प्रतिक्षण विद्यमान है और वह परम कृपालु है जिसकी दया के कारण हमारा प्रत्येक क्षण सुखद बीत रहा है, उसे ही हम ईश्वर अथवा श्री कृष्ण कहते हैं।
अब,
कोई यह भी पूछ सकता है कि परमपिता के साथ फिर श्री राधा का नामास्मरण क्यों आवश्यक है और इनका स्थान क्या है उनके साथ ??
!! जी हाँ !!
बहुत विचारणीय है!
जब जगतपिता का नामाकरण करने वाला कोई नहीं था तो उसी स्थिति में जगतमाता का भी नामकरण करने वाला कोई नहीं था।
किन्तु भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें राधा कहके संबोधित किया।

राधा = र + आधा
प्रभु के संबोधन का तात्पर्य इस प्रकार है :-
र अर्थात राष्ट्र और आधा अर्थात अर्ध स्वामित्व अथवा दायित्व।
कुल मिलाकर भगवान के आधे राष्ट्र का जिसे स्वामित्व है अथवा जिसके दायित्व पर उनके राष्ट्र का उदय हुआ उन्हें ही वे राधा कहते हैं।
बाद में चलकर भगवान श्री कृष्ण को अगणित नाम से जाना जाने लगा। क्योंकि उनके राष्ट्र की संख्या भी अगणित हो चुकी थी अतः मानतव्य भी अगणित हो गए।

आपका शुभचिन्तक- अंगिरा प्रसाद मौर्य ।
***जय श्री राधेकृष्ण***

शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

सरस्वती वंदना

गुणगान करें, सम्मान करें !
जगवासी नित अभिमान करें !
समहित सत्य सदा कर दे !
हिय में स्वर भर दे !
माँ ऐसा ही वर दे !

हम पुत्र बनें, हम इत्र बनें !
हम श्रेष्ठ रहें, जग-मित्र बनें !
हम श्रमिक बनें, स्वामित्व ठने !
कलह निवारण पर्ण कर दे !
हिय में स्वर भर दे !
माँ ऐसा ही वर दे !

एकचित्त बनें, चहुँओर रहें !
हम नृत्य करें तो मोर रहें !
यथा-व्यथा, जग शोर रहे !
सब विद्याएँ तर कर दे !
हिय में स्वर भर दे!
माँ ऐसा ही वर दे !
   ~~~~~~~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्या ।
कृति पूर्णता की ओर अभी अग्रसर !