शनिवार, 2 अगस्त 2014

ईश्वर, परमपिता अथवा भगवान के सन्दर्भ में

सादर नमन मित्रों !

हम तो केवल और केवल भगवान अथवा ईश्वर को मानते हैं।
जो परमपिता हैं।
सृष्टि के उदयकाल में पहले उनका ही उदय हुआ और उनका नामाकरण करने वाला कोई था ही नहीं, इसीलिए उन्हें परमपिता कहके संबोधित किया जाता है।
बाद में कुछ ज्ञानियों और महाविद्वानों ने उन्हें कृष्ण कह दिया। कृष्ण का तात्पर्य घनघोर अंधकार को दूर करने वाले से है। हिन्दी शब्दार्थ के नियमावली अनुसार कृष्ण का तात्पर्य कृपालु से भी है। अर्थात:- जिसने अंधकार को दूर किये रखा है अथवा जिसके सामर्थ्य पर प्रकाश अथवा सत्य प्रतिक्षण विद्यमान है और वह परम कृपालु है जिसकी दया के कारण हमारा प्रत्येक क्षण सुखद बीत रहा है, उसे ही हम ईश्वर अथवा श्री कृष्ण कहते हैं।
अब,
कोई यह भी पूछ सकता है कि परमपिता के साथ फिर श्री राधा का नामास्मरण क्यों आवश्यक है और इनका स्थान क्या है उनके साथ ??
!! जी हाँ !!
बहुत विचारणीय है!
जब जगतपिता का नामाकरण करने वाला कोई नहीं था तो उसी स्थिति में जगतमाता का भी नामकरण करने वाला कोई नहीं था।
किन्तु भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें राधा कहके संबोधित किया।

राधा = र + आधा
प्रभु के संबोधन का तात्पर्य इस प्रकार है :-
र अर्थात राष्ट्र और आधा अर्थात अर्ध स्वामित्व अथवा दायित्व।
कुल मिलाकर भगवान के आधे राष्ट्र का जिसे स्वामित्व है अथवा जिसके दायित्व पर उनके राष्ट्र का उदय हुआ उन्हें ही वे राधा कहते हैं।
बाद में चलकर भगवान श्री कृष्ण को अगणित नाम से जाना जाने लगा। क्योंकि उनके राष्ट्र की संख्या भी अगणित हो चुकी थी अतः मानतव्य भी अगणित हो गए।

आपका शुभचिन्तक- अंगिरा प्रसाद मौर्य ।
***जय श्री राधेकृष्ण***

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