बुधवार, 31 दिसंबर 2014

नववर्ष मंगलमय हो !

धर्म ही नहीं ! धार्मिकता भी बढ़े,
मन ही नहीं ! मानसिकता भी बढ़े,
ईश्वर से करते हैं हम ये कामना !
केवल हम ही नहीं ! हमारे भी बढ़ें।
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कर्तव्यों पर रोज लड़ें !
हम पीड़ा ना संताप भरें!
"मौर्य" प्रखर व्यक्तित्व हमारा।
हम अपनों के ओज बनें।

नया वर्ष है नई उमंगें,
नव-सूरज की नई तरंगें,
हममे इतना साहस भर दे,
हम हर्षों के हर्ष बनें।
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नूतन पल के सोच नए हों,
अपनेपन के खोज नए हों,
हे ईश हमारी यही कामना !
वसुधा के अब लोग नए हों।
             ~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्य।
दिनाँक:- ३१/१२/२०४

सोमवार, 22 दिसंबर 2014

स्तय और झूठ

कठोर परिस्थितियों में सत्य कहना बहुत कठोर होता है, किन्तु वाणी की मधुरता हेतु झूठ बोलना अथवा सत्य को दबाना महापाप अर्थात आत्महत्या के समान है।
कभी ऐसी परिस्थिति में यदि आप पड़ जाएँ और आपको दृढ़ विश्वास हो कि यहाँ पर सत्य कहना अनुचित है तो वचनमुक्त हो जाएँ। अर्थात मूक अथवा चुप रहें किन्तु कलह निवारण हेतु झूठ न बोलें अन्यथा आप महाकलह को न्योता दे बैठेंगे।
किसी की जान बचाने हेतु ही झूठ की अनुमति है और वह भी जिसका व्यक्तित्व मानवीय हो केवल उसके लिए ही।
जय श्री कृष्ण !

बुधवार, 10 दिसंबर 2014

लौट कर कुछ भी नहीं आता।

आ जाता अगर गुजरा हुआ जमाना कभी वापस,
लोग फूल तोड़ने की बजाय पेड़ ही काट लाते।
~~~~~~~~~APM

मंगलवार, 9 दिसंबर 2014

अभिव्यक्ति

व्यक्तित्व सबका अपना अच्छा ही होता है,
कोई कुआँ खोदता है तो कोई पानी चुरा के पीता है।
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इस संसार में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो स्वयं का अहित/बुरा चाहता हो। सब अपने दृष्टिकोण में अच्छे होते हैं रावण भी था। जिन व्यक्तियों को जैसी अभिव्यक्ति के लोगों का सानिध्य मिलता वे वैसे ही संस्कार में ढल जाते हैं।

उपर्युक्त दो पंक्तियों का तात्पर्य :- जिस प्रकार पानी किसी की संपत्ति नहीं उसी प्रकार संसार की कोई भी वस्तु किसी का नहीं है। सब सार्वजनिक है। कोई दान करता है तो कोई चुरा चुरा के रखता है।
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जय श्री कृष्ण !

दुराचारी, दुराचार और उसका प्रतिफल

दुराचारी लोग समझते हैं कि उन्होंने अपने संघर्ष अथवा पुर्व की संपत्ति उन्हीं की है। वे ये भी भूल जाते हैं कि जब उनका जन्म नहीं हुआ था तो वो सबकुछ किसी और का था। और हाँ एक तथ्य को हमेशा जानते हुए भी वो लोग नकारते रहते हैं कि जब वे नहीं रहेंगे तो सारी संपत्ति किसी और की हो जायेगी, जबकि मृत्यु का भय उन्हें प्रतिक्षण रहता है। आप अपने आस पास में देखेंगे तो ऐसे लोग अवश्य ही आपको मिल जायेंगे। उनका सबसे परिचित लक्षण घमंड है वे अति घमण्डी होते हैं। घमंड शीघ्र विनाश का अधिकारी है वह अपने पद न तो दुरूपयोग करता है और न ही कभी स्थीपा सौंपता है।
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इसी विषय पर महाभारत का प्रसंग याद आ रहा है।
आइये जानें /-
महाराज पाण्डु के स्वर्गवास के बाद उनके छोटे भाई धृतराष्ट्र सम्राट के पद पर आसीन हुए। धृतराष्ट्र का सबसे प्रिय पुत्र दुर्योधन था वह बहुत ही बलवान और पराक्रमी था। परंतु पाण्डु पुत्र युधिष्टिर से वह छोटा था। उसका एक मात्र ही कर्तव्य था अपने ज्येष्ठ भ्राता की आज्ञा का पालन करना। किन्तु वह मामा सकुनी के सानिध्य में आकर कपटी हो गया।कपट का प्रतिफल क्रोध है क्रोध घमंड का अह्वान करता है।

अपने घमंड में चूर दुर्योधन पहले युवराज बनने का हठ कर लिया। हस्तिनापुर महासभा के महामंत्री विदुर एवम् और सभी सहमंत्री सहमत नहीं हुए। तत्पश्चात वह अपने पिता धृतराष्ट्र को कूटनीति बताकर अपना निर्णय करवाने पर बाध्य कर लिया। धृतराष्ट्र की आज्ञा के कारण दुर्योधन को युवराज घोषित कर दिया गया। जब दुर्योधन युवराज बन गया तो इसके आज्ञा का पालन करना सभी का धर्म हो गया।

एक बार जुए में दुर्योधन ने सकुनी की सहायता से पांडवों सबकुछ छीन लिया। और उनलोगों को अज्ञात वास में भेज दिया। अज्ञातकाल समाप्ति के पश्चात् पांडुओं ने तय किया कि वे अब बँटवारा कर अपने अधिकार की संपत्ति में रहेंगे। किन्तु दुर्योधन को यह राश नहीं था, उसने पांडवों को कुछ न देने की हठ कर ली थी। धृतराष्ट्र अभी जीवित थे इसलिए वह युवराज ही था महाराज नहीं। बहुत सारी याचिकाओं के बाद धृतराष्ट्र ने पांडुओं को एक खंडहर दे दिया।

पांडवों ने कृष्ण एवम् देवराज इंद्र की सहायता से उस खंडहर को इंद्रप्रस्थ नामक एक विशेष एवम् भव्य महल में परिवर्तित कर दिया। जब युधिष्ठिर अपने पद पर आसीन हुए तब उन्होंने दुर्योधन समेत और सभी राज्यों के राजाओं को बुलवाया। दुर्योधन इंद्रप्रस्थ पहुँचा उसे वह महल बहुत अच्छा लगा किन्तु वह हस्तिनापुर में ही आता था इसलिए वहाँ का राजा कोई और हो यह उसे स्वीकार नहीं था।
_______क्रमशः_______

सोमवार, 1 दिसंबर 2014

भाग्य एवम् लक्ष्य

जय श्री श्याम।।सादर प्रणाम।।
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भाग्य तो अवश्य ही साथ में सबके होता है किन्तु , समय भी निर्धारित होता है। ईश्वर के कार्य में देर हो सकता है पर अंधेर नहीं।
जैसे :- किसी गाव में जमीन की सतह से पानी की सतह यदि बहुत नीचे हो तो कोई व्यक्ति एक जगह कुँआ खोदते परेशान होकर दूसरी जगह खोदता है और फिर दूसरे से तीसरे जगह किन्तु वह परेशान ही रहता है पर पानी की सतह तक नहीँ पहुँच पाता है। जबकि जो व्यक्ति धैर्य के साथ दृढ़ होकर एक ही कुँआ खोदता है वह पानी की सतह तक पहुँच जाता है।
अतः अपना प्रयास जारी रखो जितना कर सकते हो करो परंतु धीरज रखो क्योंकि आपने चाहे जैसा भी मार्ग पकड़ा है वो आपकी दृष्टि में कल भी सही था और कल भी सही होगा।
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