सोमवार, 24 मार्च 2014

जय महाकाल

हे त्रिपुरारी हे कैलाशी, कण-कण में प्रभु तुम वासी हो।
तुम जग-हन्ता तुम्हीं नियंता, सृष्टि-जगत में अविनासी हो।

भक्तों के तुम भोले-भाले, ना तुम जानो गोरे-काले,
शरण तुम्हारे जो भी आता, मोक्ष परमपद वह है पाता,

मैं शरणागत प्रभु दास तुम्हारा, यहाँ हमारा नहीं गुजारा,
तुम्ही सुझाओ मार्ग हमें अब, नमन करूँ मै बारम्बारा,

हम सब तो संतान तुम्हारे, जगतपिता तुम सबसे न्यारे,
काम-क्रोध वस रुकना पड़ता, वहाँ से हमको कौन उबारे,

अब दीन-दुखी को कौन दुहाई, तुम्ही तो हमरे हितकारी हो।
तुम जग-हन्ता तुम्ही नियंता, सृष्टि-जगत में अविनाशी हो।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
दिनाँक:-२४/०३/२०१४

रविवार, 23 मार्च 2014

क्यूँ हमे नहीं बतलाता

क्यूँ हमें नहीं बतलाता
क्यूँ हमें नहीं बतलाता
उगता सूरज फिर ढह जाता
क्यूँ हमें नहीं बतलाता

चाँद है आता चला भी जाता,
रात घनेरी दिल घबराता,
हमें तो उसकी खूब खबर है,
नेत्र हमारे बड़े प्रखर हैं,
हम उसकी चिंता नित करते,
वो कब जाता है कब आता!
क्यूँ हमें नहीं बतलाता।

सुबह सुबह एक याद है आता,
घर मेरे सूरज यदि आता,
बंद किवाड़ मै अपनी करता,
सूरज-नरम नहीं फिर जलता,
कभी यहाँ वह सर्दी लाता,
फिर गर्मी है क्यूँ लाता!
क्यूँ हमें नहीं बतलाता।

प्रकृति भी करती अपनी वाली,
कहने को सबकी रखवाली,
एक दिन देखा मैं हरियाली,
एक दिन सब पत्तों में लाली,
कभी यहाँ पर सूखा होता,
तो बाढ़ कभी आ जाता!
क्यूँ हमें नहीं बतलाता।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
दिनाँक:- २३/०३/२०१४

गुरुवार, 20 मार्च 2014

जय गौमाता

हे श्याम हिन्द में विपदा आयी, पुरी जाती नही सुनाई,
प्यार जिन्हें कभि किया था तुमने, बदले उसके है रुसवाई।

कालयवन को मार दिया था, हिन्द में उसकी फ़ौज थी आई,
अगणित का संहार किये थे, क्यूँ इनको दिए न मार गिराई,

गोरक्षा आदेश तुम्हारा, इनकी गौओं से कटुताई,
राजा भी हैं यहाँ के जितने, मांग को देते हैं ठुकराई।

हे कान्हा असहाय मैं क्यूँ हूँ, कुछ तो हमपर कर प्रभुताई,
एक एक को गिनकर मारूँ, ऐसी देता प्रकृति बनाई,
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
दिनाँक:- २०/०३/२०१४
~~~~~~~~~APM
>>>>>>>जय गोपाल<<<<<<<

रविवार, 16 मार्च 2014

जय श्री कृष्ण

किसी यहाँ उल्लास भरा है, किसी यहाँ है मातम रहता,
एक यहाँ उपहास है तेरा, एक यहाँ है वंदन रहता।

प्रभु ये कैसी माया तेरी, धर्म लगाते नित-नित फेरी
भक्तों पर तो साया तेरी, उनकी ही क्यूँ रात अँधेरी,

जो नित तेरी याद में जीता, गम घूँट है हर क्षण पीता,
गम इस दुनियाँ में उसके, लोग चलाते हल हैं मीठा,

देख ये लीला सहम गया हूँ, अब विवेक भी नहीं सहायक,
प्रतिदिन मौज यहाँ वो करते, जो भी होते हैं खलनायक,

दयानिधि तुम हे बनवारी, किंचिद विचलित दृष्टि हमारी,
कृपा करो हे ज्ञान के दाता, बनूँ तुम्हारे आज्ञाकारी,

हमें यहाँ कुछ उल्टा दिखता, किंचिद दृष्टि है तम आधारित,
दिन कटते हैं आस तुम्हारे, होगा एक दिन सत्य भी पारित,

"मौर्य" हृदय भयभीत यहाँ है, मार्ग है उसको नहीं सुझाएँ,
भटक रहा अज्ञान के कारण, ज्ञान यहाँ अब कौन बताये।

एक तुम्हीं जहाँ में हितकारी हो, सबके हिय में गिरधारी हो,
बिगड़ी हमरी कौन बनाये, तुम्हीं जहाँ में बनवारी हो।
>>>>>>>जय श्री कृष्ण<<<<<<<
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
दिनाँक:- १६/०३/२०१४
~~~~~~~~~APM

गुरुवार, 13 मार्च 2014

एक वृक्ष हमारा भी उपवन में

अरमान यही है अपने मन में, मैं सिद्ध हमेशा रहूँ गगन में,
सम्मान की आशा हमें नहीं है, एक वृक्ष हमारा भी उपवन में।

सबको शीतल छाया दे दूँ,
कुछ को अपनी काया दे दूँ,
हर जीव यहाँ पर मुस्काए बस,
खड़ा रहूँ मैं भले तपन में।

कुछ लोगों की भूख मिटाऊँ,
हर दिन उन्हें याद मैं आऊँ,
उपहार बनूँ मैं यहाँ अनूठा,
ऐसी आभा भर लूँ तन में।

"मौर्य" यहाँ क्या याद करेंगे,
ओ बस मेरी फरियाद करेंगे,
जिसको मेरा प्यार मिला हो,
कल्पना उनकी रहूँ चमन में।
एक वृक्ष हमारा भी उपवन में।।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
दिनाँक:-१३/०३/२०१४
~~~~~~~~~APM

बुधवार, 12 मार्च 2014

अपने अन्दर दम भरना है

अपने अन्दर दम भरना है, नहीं हौंसला कम करना है,
लक्ष्य हिमालय की चोटी हो, आगे उसके ना डिगना है।

उपकार गैर का बेमतलब है,
उपकार में अपनी ना धुनना है,
उपहार शैर आराम के लायक,
वो नहीं सुनो जो ना सुनना है।

हृदय की पीड़ा सुनते जाओ
मन को अपने ना बहकाओ,
कमल-लक्ष्य तुम रखलो मनमे,
कीचड़ में तुमको खिलना है।

लक्ष्य में अपने ही चलना है,
फूल है काँटों में चुनना है,
"मौर्य" तथ्य ना कभी भुलाना,
फूल तो काँटों में खिलना है।

आज तुम्हारे पास नहीं कुछ,
आता तुमको रास नहीं कुछ,
कर्म सहारे सब आता है,
कर्म-अवज्ञा ना करना है।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
दिनाँक:-१२/०३/२०१४
~~~~~~~~~APM
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यहाँ पर एक "कर्म" का तात्पर्य कर्तव्य से है। इन दोनों में से आप किसी का भी चुनाव कर सकते है।
>>>>>>>जय श्री कृष्ण<<<<<<<

गुरुवार, 6 मार्च 2014

हे कान्हा तुम कब आओगे

हे कान्हा तुम कब आओगे? नहीं सुखद तुम जब पाओगे!
मुरली सुन को हिय है प्यासा, हे कान्हा तुम कब आओगे?

अराजकता की होली होती, तीक्ष्ण व्यंग यँह बोली होती,
देख-सहन अब नहीं ये होता, मनवाँ तेरे खातिर रोता,
तुम्ही प्रेम के रस लाओगे, हे कान्हा तुम कब आओगे?

राजनीति का पार नहीं है, गलत यहाँ व्योहार सही है,
नियम यहाँ अब नहीं कोई, व्याभिचार में दुनियाँ सोई,
नियम धरम तो तुम लाओगे, हे कान्हा तुम कब आओगे?

अपनी विपदा किसे सुनावैं, नहीं यहाँ वह राजा कोई,
मानवता की शंख बजाते, की अन्दर से शोषण होई,
तुम्हीं यहाँ पोषण लाओगे, हे कान्हा तुम कब आओगे?

था सुना देखता सब कुछ तू है, बता भला फिर चुप ही क्यूँ है,
मार्ग पे तेरे चलते हम नित, लुट गया यहाँ सब बचा ही तूँ है,
क्या हमको खुद से बिछड़ाओगे, हे कान्हा तुम कब आओगे?

हे श्याम यहाँ बस आस तुम्हारी, शुरु करो प्रभु लीला न्यारी,
क्षमा करो प्रभु "मौर्य" है विनती, जो कछु त्रुटियाँ होंय हमारी,
अब कितना सबको तड़फाओगे, हे कान्हा तुम कब आओगे?
…………………जय श्री कृष्ण…………………
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
दिनाँक:- ०६/०३/२०१४

मेरे कल्प में राम हो राम

मेरे कल्प में राम हो राम
बन जाएँ बिगड़े सब काम
मेरे कल्प में राम हो राम।।

सुने ये दुनियाँ और तमाम
धुने वाल्मीकि उल्टा नाम
करता जिनको जहाँ प्रणाम
मेरे कल्प में राम हो राम।।

नहीं यहाँ कोई बालि सामान
मिटा दिए कलुषी के काम
सुग्रीव-दिलाये उसके धाम
मेरे कल्प में राम हो राम।।

रावण विपदा का एक नाम
बना दिए प्रभु उसका काम
दियो वभीषण को निजधाम
मेरे कल्प में राम हो राम।।

नहीं बड़ा प्रभु मेरो धाम
दृष्टि पड़े अब दयानिधान
विनती करते "मौर्य" सुजान
मेरे कल्प में राम हो राम।।
बन जाएँ बिगड़े सब काम
मेरे कल्प में राम हो राम।।
………जय श्रीराम………
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
दिनाँक:-०६/०३/२०१४

मंगलवार, 4 मार्च 2014

उपकार स्वयं की दौलत (परोपकार)

उपकार की आशा सब करते हैं, विकट समय के आ जाने पर।
उपकार यहाँ पर कौन करे अब, विकट समय के ढा जाने पर।।

लोग यहाँ अब हुए स्वार्थी, अपकार-कर्म है ख्याति निरंजन,
जिसमे जितनी निर्दयता है, उसकी जय है सबका गुंजन।
अब हुआ यहाँ परिवार पराया, हाय रे दौलत हाय रे माया,
समय-चक्र ने ब्याज बढ़ाया, अब कौन हैं अपने-खो जाने पर।।………१।।
।@।उपकार यहाँ पर कौन करे अब,विकट समय के ढा जाने पर।@।

अहम् भाव अब प्रबल है इतना, कौन पुत्र को समझाता है,
शिक्षक अपना कार्य करेंगे, ज्ञान कहाँ हमको आता है,
पितु का अपने किया निरादर, प्रवृत्ति-पुत्र-समा जाता है,
आज पुत्र फिर वही है करता, सिंहासन के पा जाने पर।।………२।।
।@।उपकार यहाँ पर कौन करे अब, विकट समय के ढा जाने पर।@।

पाल-पोष हर बाप है देता, इस भविष्य का ज्ञान सभी को,
धन लायेगा बेटा एक दिन, दौलत आज निदान सभी को,
संस्कार-अबोध क्या धन लायेगा, वो तो खुद में अहम पायेगा,
संस्कार नहीं करे उनका भक्षण, बाल से युवा हो जाने पर।।………३।।
।@।उपकार यहाँ पर कौन करे अब,विकट समय के ढा जाने पर।@।

"मौर्य" जीव-उपकार धरम है, उपकार जहाँ में है सुख-पूजा,
वृक्ष को पानी इंद्र है देता, कर्तव्य है उसका हो खुश दूजा,
सूर्य-चन्द्र जहँ ईश प्रकाशित, तन-मन-धन उपकार बना है,
यहँ अपने बेगाने हो जाते हैं, चन्द-सीढ़ियाँ पा जाने पर।।………४।।
उपकार की आशा सब करते हैं,विकट समय के आ जाने पर।
उपकार यहाँ पर कौन करे अब,विकट समय के ढा जाने पर।।
०४/०३/२०१४
~~~~~~~~~Angira Prasad Maurya

अपने निश्चय से आस

निश्चय से एक पुल बांधा हूँ, लक्ष्य अभी तक ना साधा हूँ ,
यहाँ पुर्वज शान के आगे, अभी तलक तो मैं आधा हूँ।

जाना चाहूँ उन से आगे भी, मार्ग जिन्होंने दिया अभी तक,
मौर्य-वंश की व्याख्या क्या है? सम्मान-चक्र यँह पूज्य अभी तक।

अपनी अपनी सब गाते यँह, ये कभी मुझे भी भा जाता है,
"मौर्य" जरा अब आगे देखो, जन-कल्याण समा जाता है।

बौद्ध स्थिती से तुम जागो, ईश बहुत भी गुनिया क्या है,
प्रेम हृदय में परिभाषित है, नहीं विविधता दुनियाँ क्या है।

"मौर्य" कार्य बस वही करेंगे, जिनसे दुनियाँ नित फिर गाये यँह,
वो मार्ग नहीं जहँ ईश न बैठा, जो रूप मिले बस पूजे जाये वँह।।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्य
दिनाँक:-०४/०३/२०१४

रविवार, 2 मार्च 2014

संतोष-जतन

संतोष जहाँ में परम-पुण्य है, जहँ हिंसा का नाम नहीं है,
समय के आगे झुकना पड़ता, बस संतोष मुकाम वहीं है।

लक्ष्य-मार्ग में रुक जाएँ हम, भले जरा सा दुःख पायें हम,
दुःख में दिल को समझाएँ बस, दूरी नहीं निकट आये हम।

मार्ग चुनों तुम जाँच-परख कर, वहाँ पे बाँधा आनी ही है,
समझ-परिक्षा बाँधा को तुम, प्रथम-अंक तो लानी ही है।

"मौर्य" तुफानो में तुम सीखो, खड़े वृक्ष सब टुट जाते हैं,
कोमल जिनकी काया होती, वे ही किंचिद बच पाते हैं।

ना झुकना तुम कर्म के पथ पर, बाँधा किंचिद आ जाए जब,
गम को जितना सह पाओगे, मंजिल उतना गुहराए तब।

"मौर्य" उसे संतोष न समझो, जो की लुटे सदा तुम जाओ,
वर्षों से कोई तुम को लूटे, ईश की ईच्छा तुम ठहराओ।

कर्तव्य ही ईश-नाम है दूजा, लक्ष्मी की रक्षा भी इक पूजा,
कर्तव्य का दूजा रूप धरम है, कर्म भी पूजा धर्म भी पूजा।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
दिनाँक:- ०२/०३/२०१४

शनिवार, 1 मार्च 2014

सत्य

सत्य कभी भी बिका नहीं है, सुखदायक ये गोली होती,
झूठ यहाँ गिनने के लायक, इसकी ही तो बोली होती।
~~~~~~~~~APM