बुधवार, 31 दिसंबर 2014

नववर्ष मंगलमय हो !

धर्म ही नहीं ! धार्मिकता भी बढ़े,
मन ही नहीं ! मानसिकता भी बढ़े,
ईश्वर से करते हैं हम ये कामना !
केवल हम ही नहीं ! हमारे भी बढ़ें।
*******

कर्तव्यों पर रोज लड़ें !
हम पीड़ा ना संताप भरें!
"मौर्य" प्रखर व्यक्तित्व हमारा।
हम अपनों के ओज बनें।

नया वर्ष है नई उमंगें,
नव-सूरज की नई तरंगें,
हममे इतना साहस भर दे,
हम हर्षों के हर्ष बनें।
*******

नूतन पल के सोच नए हों,
अपनेपन के खोज नए हों,
हे ईश हमारी यही कामना !
वसुधा के अब लोग नए हों।
             ~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्य।
दिनाँक:- ३१/१२/२०४

सोमवार, 22 दिसंबर 2014

स्तय और झूठ

कठोर परिस्थितियों में सत्य कहना बहुत कठोर होता है, किन्तु वाणी की मधुरता हेतु झूठ बोलना अथवा सत्य को दबाना महापाप अर्थात आत्महत्या के समान है।
कभी ऐसी परिस्थिति में यदि आप पड़ जाएँ और आपको दृढ़ विश्वास हो कि यहाँ पर सत्य कहना अनुचित है तो वचनमुक्त हो जाएँ। अर्थात मूक अथवा चुप रहें किन्तु कलह निवारण हेतु झूठ न बोलें अन्यथा आप महाकलह को न्योता दे बैठेंगे।
किसी की जान बचाने हेतु ही झूठ की अनुमति है और वह भी जिसका व्यक्तित्व मानवीय हो केवल उसके लिए ही।
जय श्री कृष्ण !

बुधवार, 10 दिसंबर 2014

लौट कर कुछ भी नहीं आता।

आ जाता अगर गुजरा हुआ जमाना कभी वापस,
लोग फूल तोड़ने की बजाय पेड़ ही काट लाते।
~~~~~~~~~APM

मंगलवार, 9 दिसंबर 2014

अभिव्यक्ति

व्यक्तित्व सबका अपना अच्छा ही होता है,
कोई कुआँ खोदता है तो कोई पानी चुरा के पीता है।
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इस संसार में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो स्वयं का अहित/बुरा चाहता हो। सब अपने दृष्टिकोण में अच्छे होते हैं रावण भी था। जिन व्यक्तियों को जैसी अभिव्यक्ति के लोगों का सानिध्य मिलता वे वैसे ही संस्कार में ढल जाते हैं।

उपर्युक्त दो पंक्तियों का तात्पर्य :- जिस प्रकार पानी किसी की संपत्ति नहीं उसी प्रकार संसार की कोई भी वस्तु किसी का नहीं है। सब सार्वजनिक है। कोई दान करता है तो कोई चुरा चुरा के रखता है।
*********
जय श्री कृष्ण !

दुराचारी, दुराचार और उसका प्रतिफल

दुराचारी लोग समझते हैं कि उन्होंने अपने संघर्ष अथवा पुर्व की संपत्ति उन्हीं की है। वे ये भी भूल जाते हैं कि जब उनका जन्म नहीं हुआ था तो वो सबकुछ किसी और का था। और हाँ एक तथ्य को हमेशा जानते हुए भी वो लोग नकारते रहते हैं कि जब वे नहीं रहेंगे तो सारी संपत्ति किसी और की हो जायेगी, जबकि मृत्यु का भय उन्हें प्रतिक्षण रहता है। आप अपने आस पास में देखेंगे तो ऐसे लोग अवश्य ही आपको मिल जायेंगे। उनका सबसे परिचित लक्षण घमंड है वे अति घमण्डी होते हैं। घमंड शीघ्र विनाश का अधिकारी है वह अपने पद न तो दुरूपयोग करता है और न ही कभी स्थीपा सौंपता है।
*********
इसी विषय पर महाभारत का प्रसंग याद आ रहा है।
आइये जानें /-
महाराज पाण्डु के स्वर्गवास के बाद उनके छोटे भाई धृतराष्ट्र सम्राट के पद पर आसीन हुए। धृतराष्ट्र का सबसे प्रिय पुत्र दुर्योधन था वह बहुत ही बलवान और पराक्रमी था। परंतु पाण्डु पुत्र युधिष्टिर से वह छोटा था। उसका एक मात्र ही कर्तव्य था अपने ज्येष्ठ भ्राता की आज्ञा का पालन करना। किन्तु वह मामा सकुनी के सानिध्य में आकर कपटी हो गया।कपट का प्रतिफल क्रोध है क्रोध घमंड का अह्वान करता है।

अपने घमंड में चूर दुर्योधन पहले युवराज बनने का हठ कर लिया। हस्तिनापुर महासभा के महामंत्री विदुर एवम् और सभी सहमंत्री सहमत नहीं हुए। तत्पश्चात वह अपने पिता धृतराष्ट्र को कूटनीति बताकर अपना निर्णय करवाने पर बाध्य कर लिया। धृतराष्ट्र की आज्ञा के कारण दुर्योधन को युवराज घोषित कर दिया गया। जब दुर्योधन युवराज बन गया तो इसके आज्ञा का पालन करना सभी का धर्म हो गया।

एक बार जुए में दुर्योधन ने सकुनी की सहायता से पांडवों सबकुछ छीन लिया। और उनलोगों को अज्ञात वास में भेज दिया। अज्ञातकाल समाप्ति के पश्चात् पांडुओं ने तय किया कि वे अब बँटवारा कर अपने अधिकार की संपत्ति में रहेंगे। किन्तु दुर्योधन को यह राश नहीं था, उसने पांडवों को कुछ न देने की हठ कर ली थी। धृतराष्ट्र अभी जीवित थे इसलिए वह युवराज ही था महाराज नहीं। बहुत सारी याचिकाओं के बाद धृतराष्ट्र ने पांडुओं को एक खंडहर दे दिया।

पांडवों ने कृष्ण एवम् देवराज इंद्र की सहायता से उस खंडहर को इंद्रप्रस्थ नामक एक विशेष एवम् भव्य महल में परिवर्तित कर दिया। जब युधिष्ठिर अपने पद पर आसीन हुए तब उन्होंने दुर्योधन समेत और सभी राज्यों के राजाओं को बुलवाया। दुर्योधन इंद्रप्रस्थ पहुँचा उसे वह महल बहुत अच्छा लगा किन्तु वह हस्तिनापुर में ही आता था इसलिए वहाँ का राजा कोई और हो यह उसे स्वीकार नहीं था।
_______क्रमशः_______

सोमवार, 1 दिसंबर 2014

भाग्य एवम् लक्ष्य

जय श्री श्याम।।सादर प्रणाम।।
********
भाग्य तो अवश्य ही साथ में सबके होता है किन्तु , समय भी निर्धारित होता है। ईश्वर के कार्य में देर हो सकता है पर अंधेर नहीं।
जैसे :- किसी गाव में जमीन की सतह से पानी की सतह यदि बहुत नीचे हो तो कोई व्यक्ति एक जगह कुँआ खोदते परेशान होकर दूसरी जगह खोदता है और फिर दूसरे से तीसरे जगह किन्तु वह परेशान ही रहता है पर पानी की सतह तक नहीँ पहुँच पाता है। जबकि जो व्यक्ति धैर्य के साथ दृढ़ होकर एक ही कुँआ खोदता है वह पानी की सतह तक पहुँच जाता है।
अतः अपना प्रयास जारी रखो जितना कर सकते हो करो परंतु धीरज रखो क्योंकि आपने चाहे जैसा भी मार्ग पकड़ा है वो आपकी दृष्टि में कल भी सही था और कल भी सही होगा।
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शनिवार, 22 नवंबर 2014

लोगों के जीने की तरकश

लोगों में जीने की तरकश कुछ इस तरह है यारों,
किसी ने नाम बदल दिया तो किसी ने भगवान बदल दिया।
~~~~~~~~~APM

शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2014

जय श्री कृष्ण

भगवान ने हमसे पूँछा -
लोग तो दिन बदलने के साथ मेरा नाम भी बदल देते हैं, दिन तुम्हारे भी बदलने वाले हैं क्या विचार है ?
हमने तुरंत कहा ?
नाम तो वो बदलते हैं जो गुमनाम को पूजते हैं,
हम फेर बदल आवश्यक नहीं समझते, हम शुभनाम को पूजते हैं।
~~~~~~~~~ APM
जय श्री कृष्ण

गुरुवार, 9 अक्टूबर 2014

पढ़ा और गढ़ा में अंतर :-

जो पढ़ा है वह किताबों में उलझ कर रह जाता है, जबकि एक गढ़ा व्यक्ति नए सिरे से ज्ञान का नव-निर्माण कर देता है।
_________ मौर्य ।

बुधवार, 27 अगस्त 2014

सेंसर बोर्ड ।। पारखी मंडल ।। अभिवेचन संघ

सबको बहुत पीड़ा होती है जब बलात्कार और दुष्कर्म जैसी घटनाएँ सामने आती हैं। हमारे देश का शासन भी इसमें चिंतित होता है और साथ में आश्चर्य भी अनुभव करता है। मंथन करता है चिंतन करता है किन्तु सब व्यर्थ जाता है।

आखिर क्यों ??????
बहुत ही विचारणीय है।

यदि हमारी मानें तो इनसब घटनाओं का श्रेय सेंसर बोर्ड एवं फ़िल्मी जगत को जाता है जो सरकार द्वारा आधारभूत हैं।
इनके परिजनों के साथ ऐसी घटनाएँ इसलिए नहीं घटतीं क्योंकि इनके साथ सरकारी सुरक्षा है , ये धनवान हैं, निजी सुरक्षाबलों के साथ भी चलते हैं।
अन्यथा फिल्मों में कामोद्दीपक(porn) अभिनय करने वाली अभिनेत्रियों के साथ यह सबसे ज्यादा घटित होता। साथ ही अभिनेताओं के परिजनों के साथ भी।
ये अवैध भी नहीं होता क्योंकि ये व्यक्ति इसी के प्रचार-प्रसार में लिप्त हैं।

आपने कई बार सुना होगा कि अभद्र पहनावों से ही इस दुष्कर्म की संख्या बढ़ी है, जबकि सबसे अभद्र पहनावे अभिनेत्रियों के ही होते है, अभद्र पहनावों का प्रचार भी इन्हीं के द्वारा होता है।

लेकिन आपने कभी नहीं सुना होगा कि विद्या बालन के साथ दुष्कर्म हुआ, आपने कभी नहीं सुना होगा की प्रियंका चोपड़ा के साथ दुष्कर्म हुआ, आपने कभी नहीं सुना होगा की सनी लियोन अथवा किसी अभिनेता के परिजनों के साथ दुष्कर्म हुआ।

आखिर क्यूँ ???????
इस प्रश्न का उत्तर हम आपसे जानना चाहेंगे ?
Www.drishtikonjagat.blogspot.com

आपका शुभचिन्तक- अंगिरा प्रसाद मौर्या(एक अंगारयुक्त देशभक्त) ।

!!*!! वन्दे - मातरम् !!*!!

रविवार, 24 अगस्त 2014

।। लव जेहाद ।। love jehad

*********
भारत के प्रहरी हम हैं, हमे नहीं आज्ञा अब चहिए,
आरत के शहरी हम हैं, हमें नहीं संज्ञा अब चाहिए।~~~ APM
*********

-: love जेहाद :-

लव जेहाद का शाब्दिक अर्थ "धर्मान्तरण हेतु प्रेम करना है" ।
जबकि इसका अक्षरसह अथवा सकारात्मक अर्थ धर्म हेतु प्रेम होना चाहिए, जो आधुनिक परिवेश में मानों लुप्त हो गया है।
"जेहाद" एक उर्दू शब्द है जिसका तात्पर्य धर्म से है। परन्तु आज के परिवेश में इसकी धारणा और अवधारणा दोनों परिवर्तित कर दी गयी हैं, अपने आस पास निरिक्षण कर आप इस तत्व को स्वयं भी समझ सकते हैं।

हमारा मूल विषय "लव जेहाद" का प्रतिकार है, इसे प्रेम विवाह पर प्रहार न मानें तो ही विचार नियत मार्गों द्वारा आपके मष्तिष्क और परमष्तिष्क में प्रवेश कर सकता है।
जय श्री कृष्ण !

इसका प्रतिकार करने हेतु सर्वप्रथम अपने भाषा को परिपक्व करने की आवश्यकता है, अर्थात- उसमे से अपशिष्ट पदार्थों एवं तत्वों को निकाल कूड़ेदान में फेंकने की आवश्यकता है।
पुनः सम्पूर्ण हिन्दू समाज को अपनी जनसंख्या वृद्धि हेतु कड़े निर्णय करने की आवश्यकता है। कम से कम अपने लिए नहीं तो देश के लिए, देश के लिए नहीं तो सृष्टि के लिए आवश्यक है अन्यथा इस जगत से मानवों का पतन सम्भव है।

-: भाषा :-
जिस प्रकार सभी अस्त्रों-शस्त्रों से सुसज्जित होना परम आवश्यक है परन्तु उन्हीं अस्त्रों का उपयोग अपने परिजनों अथवा देश की प्रजा पर करना वर्ज्य है, ठीक उसी प्रकार यदि आप संसार की समस्त भाषाओँ को जानते हैं अथवा जानने का प्रयास करते हैं तो उत्तम नहीं अति उत्तम है किन्तु अपने परिवेश में उनकी छाप छोड़ना अथवा वक्तव्यों में मातृभाषा को छोड़ अधिकतर दूसरी भाषाओँ का उपयोग हमारी संस्कृति(राष्ट्रीय चरित्र) एवं भविष्य के लिए दुर्गति का कारण अथवा घातक है।

भाषाएँ जानना विद्या है, कलाएँ जानना विद्या है और इन्हीं विद्याओं के संयोग से ज्ञान का निर्माण हुआ है, अथवा ऐसा भी कह सकते हैं की विद्याएँ ज्ञान के अंतर्गत अथवा इसी की शाखाएँ या प्रकार हैं। इन वक्तव्यों को एक ही सुर में सभी शिक्षाविद अथवा शिक्षक तुरंत स्वीकार कर लेंगे।
किन्तु हमें पीड़ा तब होती है जब विद्याओं के उपयोग करने का सिद्धांत आधुनिक ज्ञान के अंतर्गत आने के बजाय उसके अंतर में धकेल दिया गया है।

भाषाएँ ही व्यक्ति के वर्ग और चरित्र का प्रमाण हैं। अतः विश्व-श्रेष्ठ हिन्दी भाषा को परिपक्व बनाने की आज महती आवश्यकता है।
।।ॐ।। हम आपसे सहयोग हेतु प्रार्थना करते हैं।।ॐ।।
जय श्री कृष्ण !

-: जनसंख्या वृद्धि :-
यदि हिन्दुओं ने अपनी जनसंख्या वृद्धि नहीं की तो भविष्य में कोई जान ही नहीं पायेगा कि मानव कौन है ?
मानवता क्या है ?
मानव के गुणधर्म क्या हैं ?
यदि आप कल्पना करेंगे तो पाएंगे कि कल केवल आदमी बचेगा ! कल केवल इंसान बचेगा ! जो इंसानियत के नाम पर रोज हैवानियत का खेल करते मिलेंगे।

वास्तव में जो लोग स्वयं को हिन्दी भाषी कहते हैं उन्हें "आदमी" और "इंसान" जैसे शब्दों से दूर रहने की कतिपय आवश्यकता है। विशेषतः विशेष व्यक्तियों के लिए ऐसे शब्द वर्जित ही होने चाहिए।
कारण:-
हमारी हिन्दी शब्दावली के नीति नियमों के अनुसार दूसरे भाषाओं के सभी शब्दों का स्पष्ट अर्थ नहीं निकलता, क्योंकि दूसरी भाषाएँ वैज्ञानिक भाषा न होकर रटंत अथवा बलपूर्वक विद्यमान हैं।

जैसे :- आदमी और मनुष्य :-
आदमी= आद+मी अथवा आदम+ई। इसका कोई अर्थ अथवा तात्पर्य स्पष्ट नहीं हो सकता।
तथा
मनुष्य= मनु+अष्य। मनु अर्थात जगत का पहला व्यक्ति, अष्य का आशय आने से और अर्थ जन्म लेने से है। अर्थात मनु से जन्म लेने वालों को मनुष्य कहते हैं।

इसी प्रकार:- इंसान और मानव :-
इंसान = इन+सान। अब आप अर्थ निकालने जायेंगे तो पता चलेगा कि क्या सान किसको सान किसकी सान और कैसी सान।
परन्तु,
मानव= मान+अव। अर्थात मान-सम्मान हेतु जो अवतरित हुआ है उसे मानव कहते हैं।
अथवा
सम्मान ही जिसका आधार हो वही मानव है।
इसी प्रकार मानवता, अर्थात जिन कर्मों के करने से अनादि काल तक व्यक्ति की आलोचना ना की जा सके वही मानवता के कर्म अथवा गुणधर्म हैं।
*********

लव जेहाद को लेकर राजनितिक गतिविधि :-

राजनितिक गतिविधि तो आज किसी से नहीं छुपी है इसलिए कम शब्दों में निपटारा करने का अवश्य प्रयास करेंगे।
इस गंभीर तत्व को लेकर हमे अखिलेश यादव की बात बहुत ही हास्यास्पद और गंभीर लगी।
हास्यास्पद इसलिए लगी क्योंकि अखिलेश जनता नहीं जननायक हैं । यदि एक मुख्यमंत्री इस प्रकार बात करता है तो आप उसकी मानसिकता समझ सकते हैं।
गंभीर इसलिए लगा क्योंकि जो अखिलेश ने कहा वह सही कहा और हम उनका समर्थन करते हैं। हम सहमत केवल इसलिए नहीं हैं क्योंकि अखिलेश की यह प्रतिक्रिया लव जेहाद के लिए अनुकूल नहीं।

अखिलेश ही नहीं राम को मानने वाला और प्रत्येक युवा बुद्धिजीवी व्यक्ति हेमामालिनी पर गलत टिपण्णी करे तो भी उचित है। क्योंकि भारतीय जनता पार्टी एक ओर राम और कृष्ण का अनुशरण करती है और दूसरी ओर इसके कृत्य श्री राम के चरित्र और उपदेशों का निन्दा करते हैं।
भगवान कहे जाने वाले श्री राम जी ने एक धोबी के अप्रत्यक्ष आरोप पर अपनी पत्नी सीता जी का त्याग कर दिया, जबकि राम राम कहने वाली भारतीय जनता पार्टी किसको अपना टिकट दे देगी इसका कोई नापतौल अथवा सिद्धांत नहीं है। चंद पैसों के लिए फिल्मों में नाचने वाली हेमामालिनी भाजपा की सांसद हैं, इससे आप भाजपा के चरित्र का अनुमान लगा सकते हैं।
*********

मूल विषय लव जेहाद है। और इसका प्रतिकार करना अति आवश्यक है। यदि भाजपा इसे समाप्त करना चाहती है तो उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार आना निश्चित है। भाजपा से अनुरोध है कि अपनी पार्टी/दल में बहिष्कार करने योग्य तत्वों का समावेश न करे, अन्यथा सबको ज्ञात है कि परिवर्तन ही संसार का नियम है। लव जेहाद केवल उत्तर प्रदेश का मामला नहीं है यह सम्पूर्ण मानवजाति को आघात है। इस मामले के आरोपियों को तुरंत ही मृत्यु-दान देने से कदापि न चूकें /-
www.facebook.com/merelekh

आपका शुभचिन्तक ___ अंगिरा प्रसाद मौर्या।

!!*!! जय हिन्द !!*!! जय भारत !!*!!

शनिवार, 2 अगस्त 2014

ईश्वर, परमपिता अथवा भगवान के सन्दर्भ में

सादर नमन मित्रों !

हम तो केवल और केवल भगवान अथवा ईश्वर को मानते हैं।
जो परमपिता हैं।
सृष्टि के उदयकाल में पहले उनका ही उदय हुआ और उनका नामाकरण करने वाला कोई था ही नहीं, इसीलिए उन्हें परमपिता कहके संबोधित किया जाता है।
बाद में कुछ ज्ञानियों और महाविद्वानों ने उन्हें कृष्ण कह दिया। कृष्ण का तात्पर्य घनघोर अंधकार को दूर करने वाले से है। हिन्दी शब्दार्थ के नियमावली अनुसार कृष्ण का तात्पर्य कृपालु से भी है। अर्थात:- जिसने अंधकार को दूर किये रखा है अथवा जिसके सामर्थ्य पर प्रकाश अथवा सत्य प्रतिक्षण विद्यमान है और वह परम कृपालु है जिसकी दया के कारण हमारा प्रत्येक क्षण सुखद बीत रहा है, उसे ही हम ईश्वर अथवा श्री कृष्ण कहते हैं।
अब,
कोई यह भी पूछ सकता है कि परमपिता के साथ फिर श्री राधा का नामास्मरण क्यों आवश्यक है और इनका स्थान क्या है उनके साथ ??
!! जी हाँ !!
बहुत विचारणीय है!
जब जगतपिता का नामाकरण करने वाला कोई नहीं था तो उसी स्थिति में जगतमाता का भी नामकरण करने वाला कोई नहीं था।
किन्तु भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें राधा कहके संबोधित किया।

राधा = र + आधा
प्रभु के संबोधन का तात्पर्य इस प्रकार है :-
र अर्थात राष्ट्र और आधा अर्थात अर्ध स्वामित्व अथवा दायित्व।
कुल मिलाकर भगवान के आधे राष्ट्र का जिसे स्वामित्व है अथवा जिसके दायित्व पर उनके राष्ट्र का उदय हुआ उन्हें ही वे राधा कहते हैं।
बाद में चलकर भगवान श्री कृष्ण को अगणित नाम से जाना जाने लगा। क्योंकि उनके राष्ट्र की संख्या भी अगणित हो चुकी थी अतः मानतव्य भी अगणित हो गए।

आपका शुभचिन्तक- अंगिरा प्रसाद मौर्य ।
***जय श्री राधेकृष्ण***

शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

सरस्वती वंदना

गुणगान करें, सम्मान करें !
जगवासी नित अभिमान करें !
समहित सत्य सदा कर दे !
हिय में स्वर भर दे !
माँ ऐसा ही वर दे !

हम पुत्र बनें, हम इत्र बनें !
हम श्रेष्ठ रहें, जग-मित्र बनें !
हम श्रमिक बनें, स्वामित्व ठने !
कलह निवारण पर्ण कर दे !
हिय में स्वर भर दे !
माँ ऐसा ही वर दे !

एकचित्त बनें, चहुँओर रहें !
हम नृत्य करें तो मोर रहें !
यथा-व्यथा, जग शोर रहे !
सब विद्याएँ तर कर दे !
हिय में स्वर भर दे!
माँ ऐसा ही वर दे !
   ~~~~~~~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्या ।
कृति पूर्णता की ओर अभी अग्रसर !

गुरुवार, 31 जुलाई 2014

***
जो बात कल तक सत्य था वह आज असत्य और कल को तथ्य नहीं हो सकता।
अथवा,
आपने कल तक जिस पर विश्वास किया था, आज उसे कहने अथवा बताने हेतु पुनः चिन्तन कर लेना चाहिए।
~~~~~~~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्या।
*********
वक्तव्य भौतिक जगत हेतु ही है, इसे अध्यात्मिक जगत से कदापि न जोड़ें।

मंगलवार, 15 जुलाई 2014

इस दुनियाँ में,
जिसमें किसी के आनंदित होने से कोई अंतर नहीं आता, किसी के रोने अथवा दुखी होने से उसमे अंतर अवश्य होता है।

ब्रह्म अथवा ईश्वर या सर्वेश्वर आज केवल इसलिए किसी को नहीं मिलता है क्योंकि सब शूद्र हो गए हैं। ब्रह्म का तादात्म्य ब्राह्मणों के लिए सदा से था, आज भी है और रहेगा भी।
उसकी नीतियाँ अथवा नियम कभी नहीं बदलते क्योंकि उसके उद्योग में कभी हानि ही नहीं हुई।

सत्य वचन

इस जगत में अब केवल एक ही व्यक्ति रहा जिसे जातिगत आँका जा सकता है, और वह भगवान है। वही ब्रह्म भी और वही परमपिता भी।
बाकी सब के सब दूसरी जाति के हैं,

अनमोल वचन

आपदा कभी भी बता के नहीं आती है
और
विपदा सदैव ही सिखा के जाती है।

जब काव्य की सीमा काव्यगत हो और उसमे अपवाद न हों, गुनगुनाने से संगीत स्वयं बजने लगती है।

काव्य को गुनगुनाने मात्र से संगीतों का उदय हो जाता है।

सत्य वचन

गीत-संगीत से बढ़कर संसार में और कोई उपहार नहीं।

शनिवार, 12 अप्रैल 2014

दहेज़

दहेज का किसने प्रथा बनाई,
किसने इसकी की सुनवाई,
जान हजारों जब खतरे में,
देते ना क्यूँ तुम ठुकराई।

एक ठुकराए जग ठुकराए,
ये तो एक व्योहार बड़ा है,
तुमने माँगा जग ने माँगा,
यह इसके आधार पड़ा है।

कोई कहे ये पुत्र की ख्वाहिश,
इसमें हमरी दखल नहीं है,
अरे मूर्खों क्यूँ नहीं कहते,
भिक्षा दो हम सबल नहीं हैं।

एक ही सुर में अब सब गाओ,
क्रांति दहेज़-मुक्ति की लाओ,
भारत में अब ऐसा नारा,
जन-जन ही दिन रात लगाओ।

"मौर्य" प्रतिज्ञा ऐसी कर लो,
देश-प्रेम कण-कण में भर लो,
भारत का संसार सुखी हो,
प्रीति को ऐसी निर्झर कर दो।
*******
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
दिनाँक_________१२/०४/२०१४
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            !!*!!जय हिन्द!!*!!
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बुधवार, 9 अप्रैल 2014

हमें तुम्हारी अमल हुई है

कलम ऐ मेरी कमल बनो अब,
हमें तुम्हारी अमल हुई है।
सभी सुरों को धारण कर लो,
मानवता की कतल हुई है।

हिन्द देश के निर्माणों में,
यहाँ सभी के परिवारों में,
लज्जा के भी दीवारों में,
कैसे कितना दखल हुई है।
सभी सुरों को धारण कर लो,
मानवता की कतल हुई है।

तुम चलना सबके ही आगे,
सदाचार तुम्हरे अनुरागे,
ऐसा ऐटम बम हो जाओ,
हिंसाओं के दल भी काँपे।

दुनियाँ सारा चित्त पड़ा हो,
"मौर्य" तुम्हारा मित्र बड़ा हो,
साथ मेरे तुम जबतक रहना,
ना झुकना इंसाफ बड़ा हो,

पाया तुमको लिखना सीखा,
तुमसे ही मैं पढ़ना सीखा,
बन जाओ अब तोप हमारी,
जानूँ हालत सबल हुई है।
सभी सुरों को धारण कर लो,
मानवता की कतल हुई है।
           APM
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
दिनाँक:-०९/०४/२०१४

कलम हमारी तोप से बढ़कर

कलम हमारी तोप से बढ़कर,
कभी नरम तो कभी अकड़कर,
मन की मेरे लिख जाती है,
दुनियाँ में कुछ कह जाती है।

कभी दुखों को ये दर्शाती,
कभी हास्यमय चित्र बनाती,
कभी अँधेरों में भी आकर,
नई सुबह ये दे जाती है।

कभी प्रेम पर लिखती है ये,
कभी घृणा को दर्शाती है,
कभी हिन्द का चित्रण करके,
दुनियाँ को कुछ कह जाती है।

बस एक नहीं इसके बस में है,
दुनियाँ के जो नस-नस में है,
"मौर्य" लिखित में नहीं जो आता,
बातें उसकी कह जाती है।

समाचार भी ये लाती है,
दुराचार भी फैलाती है,
"मौर्य" पढ़े जो जिन नजरों से,
उसको वो सब दे जाती है।

माना की जग कठिन डगर है,
फिर भी इसमें भाव अमर है,
सदियों तक ये रह जाती है,
दुनियाँ में कुछ कह जाती है।
०९/०४/२०१४
              ~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्या ।

सोमवार, 24 मार्च 2014

जय महाकाल

हे त्रिपुरारी हे कैलाशी, कण-कण में प्रभु तुम वासी हो।
तुम जग-हन्ता तुम्हीं नियंता, सृष्टि-जगत में अविनासी हो।

भक्तों के तुम भोले-भाले, ना तुम जानो गोरे-काले,
शरण तुम्हारे जो भी आता, मोक्ष परमपद वह है पाता,

मैं शरणागत प्रभु दास तुम्हारा, यहाँ हमारा नहीं गुजारा,
तुम्ही सुझाओ मार्ग हमें अब, नमन करूँ मै बारम्बारा,

हम सब तो संतान तुम्हारे, जगतपिता तुम सबसे न्यारे,
काम-क्रोध वस रुकना पड़ता, वहाँ से हमको कौन उबारे,

अब दीन-दुखी को कौन दुहाई, तुम्ही तो हमरे हितकारी हो।
तुम जग-हन्ता तुम्ही नियंता, सृष्टि-जगत में अविनाशी हो।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
दिनाँक:-२४/०३/२०१४

रविवार, 23 मार्च 2014

क्यूँ हमे नहीं बतलाता

क्यूँ हमें नहीं बतलाता
क्यूँ हमें नहीं बतलाता
उगता सूरज फिर ढह जाता
क्यूँ हमें नहीं बतलाता

चाँद है आता चला भी जाता,
रात घनेरी दिल घबराता,
हमें तो उसकी खूब खबर है,
नेत्र हमारे बड़े प्रखर हैं,
हम उसकी चिंता नित करते,
वो कब जाता है कब आता!
क्यूँ हमें नहीं बतलाता।

सुबह सुबह एक याद है आता,
घर मेरे सूरज यदि आता,
बंद किवाड़ मै अपनी करता,
सूरज-नरम नहीं फिर जलता,
कभी यहाँ वह सर्दी लाता,
फिर गर्मी है क्यूँ लाता!
क्यूँ हमें नहीं बतलाता।

प्रकृति भी करती अपनी वाली,
कहने को सबकी रखवाली,
एक दिन देखा मैं हरियाली,
एक दिन सब पत्तों में लाली,
कभी यहाँ पर सूखा होता,
तो बाढ़ कभी आ जाता!
क्यूँ हमें नहीं बतलाता।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
दिनाँक:- २३/०३/२०१४

गुरुवार, 20 मार्च 2014

जय गौमाता

हे श्याम हिन्द में विपदा आयी, पुरी जाती नही सुनाई,
प्यार जिन्हें कभि किया था तुमने, बदले उसके है रुसवाई।

कालयवन को मार दिया था, हिन्द में उसकी फ़ौज थी आई,
अगणित का संहार किये थे, क्यूँ इनको दिए न मार गिराई,

गोरक्षा आदेश तुम्हारा, इनकी गौओं से कटुताई,
राजा भी हैं यहाँ के जितने, मांग को देते हैं ठुकराई।

हे कान्हा असहाय मैं क्यूँ हूँ, कुछ तो हमपर कर प्रभुताई,
एक एक को गिनकर मारूँ, ऐसी देता प्रकृति बनाई,
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
दिनाँक:- २०/०३/२०१४
~~~~~~~~~APM
>>>>>>>जय गोपाल<<<<<<<

रविवार, 16 मार्च 2014

जय श्री कृष्ण

किसी यहाँ उल्लास भरा है, किसी यहाँ है मातम रहता,
एक यहाँ उपहास है तेरा, एक यहाँ है वंदन रहता।

प्रभु ये कैसी माया तेरी, धर्म लगाते नित-नित फेरी
भक्तों पर तो साया तेरी, उनकी ही क्यूँ रात अँधेरी,

जो नित तेरी याद में जीता, गम घूँट है हर क्षण पीता,
गम इस दुनियाँ में उसके, लोग चलाते हल हैं मीठा,

देख ये लीला सहम गया हूँ, अब विवेक भी नहीं सहायक,
प्रतिदिन मौज यहाँ वो करते, जो भी होते हैं खलनायक,

दयानिधि तुम हे बनवारी, किंचिद विचलित दृष्टि हमारी,
कृपा करो हे ज्ञान के दाता, बनूँ तुम्हारे आज्ञाकारी,

हमें यहाँ कुछ उल्टा दिखता, किंचिद दृष्टि है तम आधारित,
दिन कटते हैं आस तुम्हारे, होगा एक दिन सत्य भी पारित,

"मौर्य" हृदय भयभीत यहाँ है, मार्ग है उसको नहीं सुझाएँ,
भटक रहा अज्ञान के कारण, ज्ञान यहाँ अब कौन बताये।

एक तुम्हीं जहाँ में हितकारी हो, सबके हिय में गिरधारी हो,
बिगड़ी हमरी कौन बनाये, तुम्हीं जहाँ में बनवारी हो।
>>>>>>>जय श्री कृष्ण<<<<<<<
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
दिनाँक:- १६/०३/२०१४
~~~~~~~~~APM