क्यूँ हमें नहीं बतलाता
क्यूँ हमें नहीं बतलाता
उगता सूरज फिर ढह जाता
क्यूँ हमें नहीं बतलाता
चाँद है आता चला भी जाता,
रात घनेरी दिल घबराता,
हमें तो उसकी खूब खबर है,
नेत्र हमारे बड़े प्रखर हैं,
हम उसकी चिंता नित करते,
वो कब जाता है कब आता!
क्यूँ हमें नहीं बतलाता।
सुबह सुबह एक याद है आता,
घर मेरे सूरज यदि आता,
बंद किवाड़ मै अपनी करता,
सूरज-नरम नहीं फिर जलता,
कभी यहाँ वह सर्दी लाता,
फिर गर्मी है क्यूँ लाता!
क्यूँ हमें नहीं बतलाता।
प्रकृति भी करती अपनी वाली,
कहने को सबकी रखवाली,
एक दिन देखा मैं हरियाली,
एक दिन सब पत्तों में लाली,
कभी यहाँ पर सूखा होता,
तो बाढ़ कभी आ जाता!
क्यूँ हमें नहीं बतलाता।
~~~~~~~~~अंगिरा प्रसाद मौर्या
दिनाँक:- २३/०३/२०१४
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