दुराचारी लोग समझते हैं कि उन्होंने अपने संघर्ष अथवा पुर्व की संपत्ति उन्हीं की है। वे ये भी भूल जाते हैं कि जब उनका जन्म नहीं हुआ था तो वो सबकुछ किसी और का था। और हाँ एक तथ्य को हमेशा जानते हुए भी वो लोग नकारते रहते हैं कि जब वे नहीं रहेंगे तो सारी संपत्ति किसी और की हो जायेगी, जबकि मृत्यु का भय उन्हें प्रतिक्षण रहता है। आप अपने आस पास में देखेंगे तो ऐसे लोग अवश्य ही आपको मिल जायेंगे। उनका सबसे परिचित लक्षण घमंड है वे अति घमण्डी होते हैं। घमंड शीघ्र विनाश का अधिकारी है वह अपने पद न तो दुरूपयोग करता है और न ही कभी स्थीपा सौंपता है।
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इसी विषय पर महाभारत का प्रसंग याद आ रहा है।
आइये जानें /-
महाराज पाण्डु के स्वर्गवास के बाद उनके छोटे भाई धृतराष्ट्र सम्राट के पद पर आसीन हुए। धृतराष्ट्र का सबसे प्रिय पुत्र दुर्योधन था वह बहुत ही बलवान और पराक्रमी था। परंतु पाण्डु पुत्र युधिष्टिर से वह छोटा था। उसका एक मात्र ही कर्तव्य था अपने ज्येष्ठ भ्राता की आज्ञा का पालन करना। किन्तु वह मामा सकुनी के सानिध्य में आकर कपटी हो गया।कपट का प्रतिफल क्रोध है क्रोध घमंड का अह्वान करता है।
अपने घमंड में चूर दुर्योधन पहले युवराज बनने का हठ कर लिया। हस्तिनापुर महासभा के महामंत्री विदुर एवम् और सभी सहमंत्री सहमत नहीं हुए। तत्पश्चात वह अपने पिता धृतराष्ट्र को कूटनीति बताकर अपना निर्णय करवाने पर बाध्य कर लिया। धृतराष्ट्र की आज्ञा के कारण दुर्योधन को युवराज घोषित कर दिया गया। जब दुर्योधन युवराज बन गया तो इसके आज्ञा का पालन करना सभी का धर्म हो गया।
एक बार जुए में दुर्योधन ने सकुनी की सहायता से पांडवों सबकुछ छीन लिया। और उनलोगों को अज्ञात वास में भेज दिया। अज्ञातकाल समाप्ति के पश्चात् पांडुओं ने तय किया कि वे अब बँटवारा कर अपने अधिकार की संपत्ति में रहेंगे। किन्तु दुर्योधन को यह राश नहीं था, उसने पांडवों को कुछ न देने की हठ कर ली थी। धृतराष्ट्र अभी जीवित थे इसलिए वह युवराज ही था महाराज नहीं। बहुत सारी याचिकाओं के बाद धृतराष्ट्र ने पांडुओं को एक खंडहर दे दिया।
पांडवों ने कृष्ण एवम् देवराज इंद्र की सहायता से उस खंडहर को इंद्रप्रस्थ नामक एक विशेष एवम् भव्य महल में परिवर्तित कर दिया। जब युधिष्ठिर अपने पद पर आसीन हुए तब उन्होंने दुर्योधन समेत और सभी राज्यों के राजाओं को बुलवाया। दुर्योधन इंद्रप्रस्थ पहुँचा उसे वह महल बहुत अच्छा लगा किन्तु वह हस्तिनापुर में ही आता था इसलिए वहाँ का राजा कोई और हो यह उसे स्वीकार नहीं था।
_______क्रमशः_______
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