व्यक्तित्व सबका अपना अच्छा ही होता है,
कोई कुआँ खोदता है तो कोई पानी चुरा के पीता है।
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इस संसार में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो स्वयं का अहित/बुरा चाहता हो। सब अपने दृष्टिकोण में अच्छे होते हैं रावण भी था। जिन व्यक्तियों को जैसी अभिव्यक्ति के लोगों का सानिध्य मिलता वे वैसे ही संस्कार में ढल जाते हैं।
उपर्युक्त दो पंक्तियों का तात्पर्य :- जिस प्रकार पानी किसी की संपत्ति नहीं उसी प्रकार संसार की कोई भी वस्तु किसी का नहीं है। सब सार्वजनिक है। कोई दान करता है तो कोई चुरा चुरा के रखता है।
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जय श्री कृष्ण !
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